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मंसूर अली खान पटौदी की बरसी आज:रेलवे स्टेशन से ऑटो में बैठकर पैलेस पहुंच गए थे, ड्राइवर को चाय-नाश्ता कराया और रुपए देकर भेजा; ट्रेन में पहनते थे पुराना कुर्ता-पायजामा

इंडियन क्रिकेट टीम के सबसे कम उम्र (21 वर्ष) के कैप्टन मंसूर अली खान पटौदी भोपाल में ही 5 जनवरी 1941 को जन्मे थे। वे जब 11 वर्ष की उम्र के थे, तब पिता नवाब इफ्तिखार अली खान पटौदी का निधन हो गया था। इसके बाद वे पटौदी के नाम से पहचाने जाने लगे थे।

भोपाल में उनका बचपन बीता है, यहां उनसे जुड़े कई ऐसे किस्से हैं, जो उनकी शानदार शख्सियत को भी बताते हैं। उनके करीबी बताते हैं कि एक बार तो वे रेलवे स्टेशन से अपने पैलेस तक ऑटो में चले गए थे। पैलेस पहुंचने पर बुजुर्ग ऑटो ड्राइवर को पहले चाय-नाश्ता कराया। इसके बाद रुपए देकर भेजा। दिल्ली से भोपाल आते थे तो दूसरे यात्रियों से घुल-मिल जाते थे। जब भारतीय क्रिकेट टीम के कप्तान थे, तब भोपाल में कई टूर्नामेंट कराए, ताकि यहां की प्रतिभाएं निखर सकें।

मां साजिदा सुल्तान के निधन के बाद वह भोपाल नवाब की संपत्ति के केयर टेकर रहे। बुधवार को उनकी 10वीं बरसी है। 22 सितंबर 2011 को 70 साल की उम्र में उनका निधन हो गया था।

पत्नी शर्मिला टेगौर के साथ मंसूर अली खान पटौदी।

पत्नी शर्मिला टेगौर के साथ मंसूर अली खान पटौदी।

वे आज भी भोपाल के लोगों के दिल में बसते हैं- अनवर मोहम्मद खान
पटौदी के करीबी रहे भोपाल के अनवर मोहम्मद खान उनसे जुड़े किस्से बताते हुए कहते हैं कि एक बार नवाब साहब ट्रेन से दिल्ली से भोपाल आए। मैं उन्हें रिसीव करने रेलवे स्टेशन गया था। गफलत में मैं दूसरी ट्रेन में बैठकर मंडीदीप तक पहुंच गया। इसी बीच उनका कॉल आया। कहने लगे- अनवर कहां हो? मैंने ट्रेन में ही होने की बात कही। तब उन्होंने बताया कि वे भोपाल स्टेशन पर ही हैं। इसके बाद नवाब साहब खुद ही अटैची हाथों में उठाकर स्टेशन के बाहर निकले। बाहर एक बुजुर्ग ऑटो वाले ने उन्हें पहचान लिया और छोड़ने की बात कही।

बुजुर्ग की बात को वे टाल न सके। पुराने ऑटो में बैठकर पैलेस पहुंचे। ऑटो वाले ने बताया कि साहब पूरे रास्ते बात करते रहे। घर पर चाय-नाश्ता कराया और फिर रुपए भी दिए। अनवर मोहम्मद खान बताते हैं कि भोपाल नवाब साहब के दिल में बसता था। यही कारण है कि वे आज भी भोपाल के लोगों के दिल में बसते हैं।

पटौदी रियासत के 9वें नवाब थे मंसूर
हरियाणा के गुरुग्राम से 26 किमी दूर अरावली की पहाड़ियों में बसे पटौदी रियासत का इतिहास करीब 200 साल से अधिक पुराना है। सन्‌ 1804 में स्थापित इस रियासत के पहले नवाब फैज तलब खान थे। मंसूर अली के पिता इफ्तिखार अली, 1917 से 1952 तक इस रियासत के आठवें नवाब रहे। पिता के निधन के बाद मंसूर अली खान को 9वां नवाब बनाया गया। उनकी पत्नी शर्मिला टैगोर अपने जमाने की मशहूर फिल्म अदाकारा रही हैं।

मंसूर अली से जुड़े किस्से, जो उनकी शख्सियत को खास बनाते हैं

  • पटौदी भले ही क्रिकेटर थे, लेकिन उन्हें हॉकी, फुटबॉल और साइकिलिंग, पोलो खेलने का शौक भी था। वे क्रिकेट की दुनिया से निकलकर जब भी भोपाल आते तो ऐशबाग में हॉकी जरूर खेलने जाते। फुटबॉल व साइकिल पोलो में भी उन्हें जैसे महारत हासिल थी।
  • जब वे भारतीय टीम के कप्तान थे, तब भोपाल में अपने साथी क्रिकेटरों को लाते थे। उन्होंने भोपाल के क्रिकेटरों को प्रमोट कराने के लिए कई टूर्नामेंट भी कराए। खाने और शिकार के भी वे काफी शौकीन थे। रॉयल फैमिली के सदस्यों के साथ वे शिकार करने भी जाया करते थे।
  • पटौदी अपने करीबियों को सम्मान देने में कभी पीछे नहीं रहते थे। ऐसा ही एक किस्सा है। उनके बेहद करीबी अनवर खान एक बार मिलने के लिए दिल्ली गए थे। उस समय पटौदी पत्नी व बेटे के साथ बैठे थे। जैसे ही अनवर खान उनके पास पहुंचे, पटौदी गदगद हो गए। सैफ को सम्मान के तौर पर कुर्सी से उठाकर उन्हें बैठाया।
  • पटौदी जब भी ट्रेन में सफर करते थे, तो कुर्ता-पजामा हमेशा साथ रखते थे। खास बात यह है कि कुर्ता-पजामा नया नहीं, बल्कि काफी पुराना होता था। इससे उनकी शख्सियत का अंदाजा लगता था। बिस्तर, तकिया और चादर भी खुद का रहता था। ट्रेन में वे आसानी से दूसरे यात्रियों के साथ घुल-मिल जाते थे।
  • पिता इफ्तिखार अली की याद में वे ‘पटौदी ट्रॉफी’ का आयोजन कराते थे। जिसमें देश-विदेश के प्रसिद्ध खिलाड़ियों को अपने साथ लेकर आते थे।
  • मंसूर अली का जन्मदिन 5 जनवरी को आता है। जब वे 1952 में अपना 11वां जन्मदिन मना रहे थे, उसी दिन पिता की दिल्ली में पोलो खेलते समय हार्ट अटैक से मृत्यु हो गई थी। पिता की मृत्यु होने से मंसूर टूट गए और फिर कभी उन्होंने अपना जन्मदिन नहीं मनाया। हालांकि, बच्चों की जिद के आगे उन्हें झुकना पड़ा था और वर्ष 2011 में उन्हें जन्मदिन मनाना पड़ा।

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