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प्रधानमंत्री सड़कों की हालत खस्ता, सुधार कराने में बड़ी लापरवाही प्रदर्शित

विभागीय अधिकारियों और ठेकेदारों की मिलीभगत से सड़कों की दुर्दशा

प्रधानमंत्री ग्राम सडक़ योजना को विभागीय अधिकारी एवं ठेकेदार पूरी तरह से बदनाम करने में उतारू हैं। प्रधानमंत्री के नाम से जुड़ी ग्राम सडक़ योजना की आरंभ में अपनी गुणवत्ता को लेकर जो पहचान बनी थी वह अब दागदार हो चुकी है। अधिकारी, ठेकेदार दोनों हाथ से सरकारी रकम बटोर रहे हैं। विगत कई सालों से एक ही स्थान पर जमे अधिकारी प्रधानमंत्री ग्राम सडक़ योजना की आड़ में करोड़ों डकार लिए हैं। पीएमजीएसवाई में हो रहे भ्रष्टाचार को लेकर सरकार कुंभकरणी नींद में है। हैरानी इस बात की है कि सरकार योजनाओं के लिए बजट स्वीकृत करती है और उसके क्रियान्वयन का काम विभाग करता है, लेकिन तय बजट उसी कार्य में व्यय हुआ या नहीं तथा संबंधित कार्य मापदंडों और गुणवत्ता पूर्ण किया गया या नहीं इसकी मानीटरिंग करना या जानकारी लेना क्या सरकार का काम नहीं है। इस योजना का उद्देश्य ग्रामीणों को सुलभ आवागमन और पहुंच की सुविधा उपलब्ध कराना है लेकिन भ्रष्टाचार के चलते जिले में यह महती योजना भ्रष्ट अधिकारियों, ठेकेदारों के लिए कमाई का साधन बनके रह गई है। अधिकारियों ने इस योजना को तिजोरी भरने का माध्यम बनाकर ठेकेदारों को घटिया निर्माण करने का लाइसेंस दे दिया है। जो सडक़ें वर्तमान में बन रही हैं उसकी गुणवत्ता निर्माण स्थलों का निरीक्षण कर जांचा जा सकता है वहीं कुछ साल बनी सडक़ों की दुर्दशा घटिया निर्माण की कहानी खुद ही बयां कर रही हैं। पांच साल तक सडक़ों के मेंटनेंस की जिम्मेदारी भी ठेकेदार पूरा नहीं कर रहे हैं। क्वालिटी कंट्रोल अधिकारियों की जांच सिर्फ खानापूर्ति प्रधानमंत्री ग्राम सडक योजना के तहत बनाई गई सडक़ों की गुणवत्ता जांचने दो प्रकार की टीम होती है पहली टीम नेशनल क्वालिटी मॉनिटर जिसे एनक्यूएम बोला जाता है जो केंद्र सरकार द्वारा नियुक्त अधिकारी होते हैं। दूसरी टीम स्टेट क्वालिटी मॉनिटर जिसे एसक्यूएम कहा जाता है। जिनका काम प्रधानमंत्री सडक़ योजना में हो रहे घोटालों की जांच करते हैं। मजे की बात ये है कि ये सब अधिकतर उसी विभाग के रिटायर्ड अधिकारी होते हैं जो एक प्रकार से ओब्लाइज़्ड होते हैं। सरकारी सेवा से रिटायर्ड थके हुए ये अधिकारी अपना हिस्सा लेकर होटल के एसी रूम में ही बैठकर निर्माण एजेंसियों को ओके रिपोर्ट देते हैं। कई इलाकों में बनाई गई सडक़ों में बनाए गए पुलों का निर्माण भी घटिया स्तर का है। सडक़ें बनकर तैयार हुई हैं और कई जगहों पर पुलियों में दरार नजर आ रही हैं। मटेरियल की मिक्सिंग भी अत्यंत दोयम दर्जे की है जिसके कारण पुल धंसकने भी लगे हैं। सडक़ों पर पुराने पुलियों का नया निर्माण भी नहीं किया गया है। ग्रामीणों का कहना है कि इन पुल-पुलियो का नया निर्माण होना चाहिए था। कई सडकें तो ऐसी है जिसका मरम्मत आज तक नहीं हुआ है। एक बार सडक़ बनने के बाद ठेकेदार को कम से कम पांच साल मेंटेनेंस करना होता है लेकिन अधिकारियो से सेटिंग कर दोबारा उस ओर देखना तक मुनासिब नहीं समझते।

भ्रष्टाचार के साये में सडक़ निर्माण –

प्रधानमंत्री ग्राम सडक़ योजना के अंतर्गत सडक़ निर्माण कार्य में ठेकेदार व प्रधानमंत्री ग्राम सडक़ योजना के अधिकारियों द्वारा जमकर भ्रष्टाचार कर स्तरहीन निर्माण सामग्री का उपयोग कर सडक़ निर्माण कराया जा रहा है। प्रदेश में हर जगह सडक़ें बनायी गई एवं पांच साल के मेंटनेन्स सहित संविदा की पूर्ति भी गई है। किन्तु भ्रष्टाचार के कारण सडक़ें केवल नाम मात्र के लिए ही निर्मित की गई। जिसमें भारी भ्रष्टाचार हुआ। गुणवत्ताहीन सडक़ निर्माण से कुछ महीनों में ही सडक़ों पर दरारें आ रहीं हैं और जगह-जगह धंसने भी लगी हैं। योजना के तहत बनी सडक़ों का कमोबेश पूरे जिले में एक जैसा हाल है। दूरस्त इलाकों में तो सडक़ो की दयनीय स्थिति है कोई देखने वाला नहीं है इस गावों में प्रधानमंत्री ग्राम सडक़ योजना में व्यापक भ्रष्टाचार होने की बात न सिर्फ ग्रामीण बल्कि सडक़ों को देखकर भी पता चलती है। अधिकारियों के सांठगांठ से ठेकेदार घटिया निर्माण कर लागत राशि का बंदरबाट कर रहे हैं। यह भी जानकारी मिली है कि वर्षों से जमे अधिकारियों ने ठेकेदारों के साथ मिलकर न केवल घटिया सडक़ का निर्माण करवाया बल्कि ठेकेदारों का भुगतान भी कर दिया है।

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