प्रदूषित हो रहा रिहंद जलाशय,बलिया नाला में बहाया जा रहा राख व कोयला

सिंगरौली।शहरी क्षेत्र में पेयजल आपूर्ति का एक मात्र स्रोत रिहंद जलाशय कोल खदानों से निकल रहे कोयलायुक्त पानी से प्रदूषित हो रहा है। जिले की सीमा पर स्थित बलिया नाला प्रदूषण की वजह बन रहा है। बलिया नाले के जरिए रिहंद जलाशय में जा रहे पानी में कोयला की मात्रा अत्यधिक है। यही वजह है कि पानी पूरी तरह से काला है। नाले के जरिए प्रदूषित पानी जिसे सीधे रिहंद जलाशय में जा रहा है। बलिया नाले के पानी में कोयला की अत्यधिक मात्रा की वजह आस-पास स्थित कोल खदानों को बताया जा रहा है। नाले के पास स्थित एनसीएल की जयंत, दुद्धिचुआ व निगाही कोल खदानों से निकलने वाला पानी बिना शुद्ध किए सीधे नाले में डाला जा रहा है। इतना ही नहीं नाले में कोल परियोजनाओं की कालोनी के सीवरेज का पानी व घरों का गंदा पानी भी बलिया नाले में डाला जा रहा है। हैरत की बात यह है कि बलिया नाला की इस दुर्दशा और रिहंद जलाशय में जा रहे दूषित पानी को लेकर जिला प्रशासन व क्षेत्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के अधिकारी दोनों ही उदासीन हैं। इस संबंध में कुछ जानकारों का कहना है कि कुछ वर्ष पहले जब यह मुद्दा उठा था तो बलिया नाले में पानी शोधित कर छोडऩे का निर्देश दिया गया था। निर्देश पर कुछ महीने अमल हुआ, लेकिन अब फिर से पहले जैसी स्थिति बन गई है।
बारिश का मौसम नजदीक आ गया है और ऐसे हालातों में सड़क और खदान क्षेत्रों की गंदगी, राखड़, कोल डस्ट नालों से बहते हुए रिहंद डेम में समा जायेगी। वैसे भी प्रदूषित हो – चुके तीन राज्यों से जुड़े इस विशाल रिहंद डेम का पानी कई स्थानों पर प्रदूषित कहा जा रहा है और इसका पानी पेयजल के उपयोग के लिए नहीं बचा है। वहीं खेती में इसके पानी की उपयोगिता भी खतरनाक हो रही है। इस मामले में पूर्व रिपोटों में भी रिहंद के पानी को कुछ स्थानों पर दूषित बताया गया था। इन स्थितियों को लेकर जिले के बुद्धिजीवी वर्ग ने चिंता जताते हुए उच्चाधिकारियों से रिहंद जलाशय को संवारने के लिए ट्रीटमेंट प्लांट लगाने की अपेक्षा की है। बताया जाता है कि यहां कई परियोजनाओं का पानी जिसमें कोल डस्ट के साथ केमिकल घुला होता है वह सीधे डैम में समा रहा है। जिसका जीता जागता उदाहरण यहां का बलिया नाला है, जहां प्रतिदिन सैंकड़ों गैलन पानी डैम में समाता है। यहां जो पानी डैम में जा रहा है वह पूरी तरह कोल मिश्रित और काला है, जिसके कारण रिहंद डैम के आस-पास के क्षेत्रों में भी कालिख उतराती नजर आती है। अगर यहीं हाल रहा तो इस विशाल डैम के जल की खेतीबाड़ी के लिए भी उपयोगिता करने से कृषकों को विचार करना पड़ेगा। ज्ञातव्य हो कि रिहंद डैम उत्तर प्रदेश के अलावा मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ के इलाकों को समेटा हुआ है। जहां इस डैम के किनारे बसे लोगों को पेयजल और खेती की उपयोगिता के लिए पानी दिया जा रहा है। लोगों का कहना है कि इस केमिकल युक्त प्रदूषण को नहीं रोका गया तो शासन की विस्तारित और विकसित योजना को प्रभावित होने से कोई नहीं रोक सकता।
एनसीएल दुद्धीचुआ से आ रहा प्रदूषित पानी-
बताया जाता है कि यहां एनसीएल दुद्धीचुआ परियोजना से कोयला व ओबी की मिट्टी को समेटे पानी का प्रवाह जारी है। जहां केमिकल युक्त यह पानी बलिया नाला से होकर रिहंद डैम में पहुंचता है जिससे जलाशय का पानी प्रदूषित हो रहा है। वहीं डैम के भराव का भी खतरा बना हुआ है। लोगों का कहना है कि बिजली परियोजनाओं के संचालन, खेतों की सिंचाई सहित भू-गर्भ जलस्रोत का स्तर बरकरार रखने जैसे बहुआयामी महत्व को देखते हुए एनजीटी द्वारा रिहंद डैम को प्रदूषण व भराव से बचाने के लिए प्रयास किए जाने चाहिए। जिसके लिए शासन ने भी कोल व बिजली परियोजनाओं के लिए तमाम गाइड लाइन निर्धारित की हैं। लेकिन इसके बाद स्थानीय बलिया नाला में एनसीएल दुद्धीचुआ परियोजना के ओबी क्षेत्र से निकलने वाले नाले से कोयले के बहाव का क्रम अनवरत जारी है। नाले के पानी की कालिमा देख इसमें व्याप्त कोयले की मात्रा का सहज ही अंदाजा लगाया जा सकता है। लोगों का कहना है कि इससे हो रहे नुकसान से वाकिफ होने के बाद भी नाले में कोयले व मिट्टी का बहाव रोकने के संबंध में किसी भी स्तर पर कारगर कदम नहीं उठाया जाना. गंभीर चिंता का विषय है। बरसात में तो कोयले के बहाव का क्रम और भी तेज हो जाता है। लोगों ने रिहंद डैम के अस्तित्व को देखते हुए इस संबंध में तत्काल आवश्यक कदम उठाये जाने की मांग की है।
मरकरी जैसा खतरनाक रसायन होता है कोयले में –
विशेषज्ञों के मुताबिक कोयले में मरकरी, आर्सेनिक व कार्बन जैसे खतरनातक रसायन पाए जाते हैं। बलिया नाले के जरिए कोयलायुक्त पानी रिहंद जलाशय में जा रहा है। इससे पानी में खतरनाक रसायन मिल रहे हैं। राख़ से अस्थमा, टीबी, कैंसर होता है। नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (एनजीटी) के अनुसार – पर्यावरण से संबंधित मामलों को संभालने के लिए 2010 में स्थापित एक सांविधिक निकाय – राख़ में मौजूद आर्सेनिक, सिलिका, एल्यूमीनियम और आयरन जैसे भारी खनिज अस्थमा, फेफड़ों में असुविधा, तपेदिक (टीबी) का कारण बन सकते हैं।



